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योहन अध्याय 02

सन्त योहन का सुसमाचार- अध्याय 02

योहन अध्याय 02 की व्याख्या

संत योहन रचित सुसमाचार में प्रभु येसु, माँ मरियम और अन्य लोगों के लिए प्रयोग किये गए शब्द बहुत ही मायने रखते हैं। संत योहन रचित सुसमाचार चिन्हों से भरा है जैसे प्रकाशना ग्रन्थ।
संत योहन रचित सुसमाचार अध्याय 02 में भी ऐसे “नाम” और चिन्ह हैं। इसलिए इन्हें ध्यान से पढ़िए।

काना में विवाह – जैसे पिछले अध्याय में हमने देखा कि संत योहन नयी सृष्टि का वर्णन करते हैं। योहन अध्याय 01 और 02 को उत्पत्ति ग्रन्थ अध्याय 01 और 02 के साथ मिलान करके हमें पढ़ने की जरुरत है।

हम हाल ही में ही संत योहन रचित सुसमाचार के अध्याय 01 और अध्याय 02 से सम्बंधित एक वीडियो बनाये हैं। उसको इस अध्याय पढ़ने से पहले जरूर देखिये।
(Why Did Jesus Call His Mother Woman in Hindi | प्रभु येसु अपनी माँ को क्यों नारी बुलाये? https://youtu.be/kHrYVYPGR08)


इस वीडियो में अध्याय 02 में “तीसरे दिन” का जो वर्णन है, वास्तव में वह “सातवाँ दिन” है। अध्याय 01 में “दूसरे दिन” को गिनती करने से हमें पता चलता थे।
इन बातों को और काना के विवाह का महत्त्व, “भद्रे” शब्द कर अर्थ और उसका अभिप्राय और भी बातों को जानने कृपया ऊपर दिया हुआ वीडियो देखिये।

मन्दिर में बिक्री करने वालों का निष्कासन – अन्य तीनों सुसमाचारों में प्रभु येसु का एक ही बार येरूसालेम जाने का वर्णन है जबकि संत योहन रचित सुसमाचार में तीन या चार बार। प्रभु येसु येरूसालेम मंदिर को शुद्ध करते हैं। इसका कारण प्रभु कहते हैं, “मेरे पिता के घर को बाजार मत बनाओ।”

यहूदियों की चुनौती – बहुत सालों से चल रहने वाले बिक्री कार्यों को रोकने का अधिकार प्रभु येसु को कहाँ मिला? यही चुनौती यहूदी प्रभु को देते हैं। और प्रभु कहते हैं, “इस मन्दिर को ढा दो और मैं इसे तीन दिनों के अन्दर फिर खड़ा कर दूँगा”।

इस अध्याय में और इस पूरे पुस्तक में बहुत सारे चिन्ह, संकेतों और बहुअर्थी शब्दों का उपयोग है। इसलिए पुस्तक को प्रार्थना के साथ ध्यान से पढ़िए।

संत योहन रचित सुसमाचार को अच्छे से समझने इसके परचिय पर बनाये गए वीडियो को देखिये।

https://youtu.be/gO3cnS1YYO0

काना में विवाह

1) तीसरे दिन गलीलिया के काना में एक विवाह था। ईसा की माता वहीं थी।

2) ईसा और उनके शिष्य भी विवाह में निमन्त्रित थे।

3) अंगूरी समाप्त हो जाने पर ईसा की माता ने उन से कहा, “उन लोगो के पास अंगूरी नहीं रह गयी है”।

4) ईसा ने उत्तर दिया, “भद्रे! इस से मुझ को और आप को क्या, अभी तक मेरा समय नहीं आया है।”

5) उनकी माता ने सेवकों से कहा, “वे तुम लोगों से जो कुछ कहें वही करना”।

6) वहाँ यहूदियों के शुद्धीकरण के लिए पत्थर के छः मटके रखे थे। उन में दो-दो तीन तीन मन समाता था।

7) ईसा ने सेवकों से कहा, “मटकों में पानी भर दो“। सेवकों ने उन्हें लबालब भर दिया।

8) फिर ईसा ने उन से कहा, “अब निकाल कर भोज के प्रबन्धक के पास ले जाओ”। उन्होंने ऐसा ही किया।

9) प्रबन्धक ने वह पानी चखा, जो अंगूरी बन गया था। उसे मालूम नहीं था कि यह अंगूरी कहाँ से आयी है। जिन सेवकों ने पानी निकाला था, वे जानते थे। इसलिए प्रबन्धक ने दुल्हे को बुला कर

10) कहा, “सब कोई पहले बढि़या अंगूरी परोसते हैं, और लोगों के नशे में आ जाने पर घटिया। आपने बढि़या अंगूरी अब तक रख छोड़ी है।”

11) ईसा ने अपना यह पहला चमत्कार गलीलिया के काना में दिखाया। उन्होंने अपनी महिमा प्रकट की और उनके शिष्यों ने उन में विश्वास किया।

12) इसके बाद ईसा अपनी माता, अपने भाइयों और अपने शिष्यों के साथ कफरनाहूम गये, परन्तु वे वहाँ थोड़े ही दिन रहे।

मन्दिर में बिक्री करने वालों का निष्कासन

13) यहूदियों का पास्का पर्व निकट आने पर ईसा येरूसालेम गये।

14) उन्होंने मन्दिर में बैल, भेड़ें और कबूतर बेचने वालों को तथा अपनी मेंज़ों के सामने बैठे हुए सराफों को देखा।

15) उन्होंने रस्सियों का कोड़ा बना कर भेड़ों और बेलों-सहित सब को मन्दिर से बाहर निकाल दिया, सराफों के सिक्के छितरा दिये, उनकी मेजे़ं उलट दीं

16) और कबूतर बेचने वालों से कहा, “यह सब यहाँ से हटा ले जाओ। मेरे पिता के घर को बाजार मत बनाओ।”

17) उनके शिष्यों को धर्मग्रन्थ का यह कथन याद आया- तेरे घर का उत्साह मुझे खा जायेगा।

यहूदियों की चुनौती

18) यहूदियों ने ईसा से कहा, “आप हमें कौन-सा चमत्कार दिखा सकते हैं, जिससे हम यह जानें कि आप को ऐसा करने का अधिकार है?”

19) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, “इस मन्दिर को ढा दो और मैं इसे तीन दिनों के अन्दर फिर खड़ा कर दूँगा”।

20) इस पर यहूदियों ने कहा, “इस मंदिर के निर्माण में छियालीस वर्ष लगे, और आप इसे तीन दिनों के अन्दर खड़ा कर देंगे?”

21) ईसा तो अपने शरीर के मन्दिर के विषय में कह रहे थे।

22) जब वह मृतकों में से जी उठे, तो उनके शिष्यों को याद आया कि उन्होंने यह कहा था; इसलिए उन्होंने धर्मग्रन्ध और ईसा के इस कथन पर विश्वास किया।

23) जब ईसा पास्का पर्व के दिनों में येरूसालेम में थे, तो बहुत-से लोगों ने उनके किये हुए चमत्कार देख कर उनके नाम में विश्वास किया।

24) परन्तु ईसा को उन पर कोई विश्वास नहीं था, क्योंकि वे सब को जानते थे।

25) इसकी ज़रूरत नहीं थी कि कोई उन्हें मनुष्य के विषय में बताये। वे तो स्वयं मनुष्य का स्वभाव जानते थे।

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संत योहन रचित सुसमाचार को अच्छे से समझने इसके परचिय पर बनाये गए वीडियो को देखिये।
संत योहन रचित सुसमाचार अध्याय 02 को अच्छे से समझने इस वीडियो को देखिये।