Greater Glory Of God

लूकस अध्याय 22

सन्त लूकस का सुसमाचार – अध्याय 22

लूकस अध्याय 22 का परिचय

संत लूकस रचित सुसमाचार अध्याय 22 में प्रभु येसु के अंतिम दिन का वर्णन है। सबकुछ आखिरी होता है – अंतिम भोज, आखिरी बार एक साथ। शिष्यों को कुछ भी नहीं पता। उनको कुछ भी समझ में नहीं आता। प्रभु सबकुछ जानते हैं। इसलिए वे दुःख से भरे रहते हैं।

प्रभु की स्थिति को ध्यान में रख कर इस अध्याय को पढ़ें और सुनें।

यूदस का विश्वासघात – केवल शिष्य जानते थे कि प्रभु अपने शिष्यों के साथ रात के समय “जैतून पहाड़” (लूकस 21:37) में रहा करते थे। प्रभु और उनके शिष्यों में ज्यादा फर्क भी नहीं दीखता था। इसलिए महायाजक और शास्त्री चाहते थे कि कोई उन्हें प्रभु को पकड़ने में मदद करें। शैतान से प्रेरित होकर यूदस महायाजकों और मन्दिर-आरक्षी के नायकों के पास जाकर अपने प्रभु का विश्वासघात करने की जानकारी दिया।

पास्का की तैयारी – प्रभु सबकुछ जानते थे। इसलिए अपने सबसे प्रिय दो शिष्यों को भेजकर पास्का की तैयारी करते हैं।

पास्का का भोज – प्रभु येसु अपनी मृत्यु को पुराने पास्का त्योहार से जोड़कर मुक्तिदायी एवं संस्कार के रूप में नये पास्का के रूप में अपने शिष्यों को देने वाले थे। इसलिए पास्का भोज को अपने अंतिम भोज के रूप में वे ग्रहण करते हैं। प्रभु येसु इसके पहले भी दो बार अपने शिष्यों के साथ पास्का भोज खाये थे। लेकिन इस बार का बहुत ही अलग और विशेष था। क्योंकि प्रभु ने कहा, “मैं कितना चाहता था कि दुःख भोगने से पहले पास्का का यह भोजन तुम्हारे साथ करूँ”।

पवित्र यूखरिस्त की स्थापना – पास्का भोज के समय जिन शब्दों का प्रयोग प्रभु ने किया उनको बदल कर प्रभु नये पास्का की स्थापना करते हैं। अगले दिन होने वाली अपनी बलि को एक संस्कार के रूप में प्रभु यहाँ स्थापित कर रहे थे। पवित्र यूखरिस्त की स्थापना के शब्दों पर ध्यान देने पर हमें यह सत्य समझ में आता है।

यूदस के विश्वासघात का संकेत – प्रभु सबकुछ जानते थे। वे जानते थे कि यूदस जाकर उनके विरोधयों से मिलकर आया है। लेकिन प्रभु उसको रोकते नहीं और न तो इसके बारे में अपने अन्य शिष्यों से खुलासा करते हैं। क्योंकि उन्हें इसी दिन का इंतज़ार था।

शिष्यों में बड़ा कौन – उनके शिष्य स्थिति को समझ नहीं पा रहे थे। उन में विवाद छिड़ गया। प्रभु के अनुसार सबसे बड़ा व्यक्ति सबसे छोटा और सबका सेवक होना चाहिए। इस शिक्षा का प्रमाण वे स्वयं अपने शिष्यों के पाँव धोकर दिए।

प्रेरितों का पुरस्कार – स्वर्गराज्य में प्रभु के साथ शासन करने का अधिकार ही प्रेरितों का पुरस्कार है। इसके लिए उन्हें प्रभु का अनुसरण कर अपने आपको बलि चढ़ाना पड़ा।

पेत्रुस की भावी निर्बलता – भावना से भरकर पेत्रुस प्रभु के लिए अपना जीवन देने के लिए भी तैयार हो जाते हैं। लेकिन प्रभु कहते हैं कि मरना तो बहुत दूर की बात, तीन बार वह अपने प्रभु को अस्वीकार करेंगे। हम जानते हैं कि ऐसा हुआ भी।

भावी संकट – माहौल पूरी तरह बदलता जा रहा था। शांति का राजा तलवार खरीदने की बात करते हैं और आश्चर्य की बात यह है कि पहले से उनके पास दो तलवारें थे।

प्रभु की प्राणपीड़ा – जैसे हम पहले देख चुके हैं कि प्रभु जैतून पहाड़ में रात बिताया करते थे। उस रत भी वहीं थे। वे इतना व्याकुल हो उठते हैं कि “उनका पसीना रक्त की बूँदों की तरह धरती पर टपकता रहा”। क्या ऐसे होता है? जी हाँ। Hematohidrosis नामक एक बीमारी है जो एक व्यक्ति के बहुत ज्यादा दबाव और चिंता में पड़ने के कारण होता है। (इसके बारे में और जानकारी आप सर्च कर सकते हैं। )

ईसा की गिरफ़्तारी – यूदस दुश्मनों के दल का अगुआ बन कर प्रभु को पकड़ने आता है। कल्पना करके देखिये वहाँ का माहौल कैसा रहा होगा। इतना ही नहीं वह चुम्बन दे कर प्रभु को पकड़ाता है। शिष्य तलवार भी चलाते हैं और प्रभु अपना अंतिम चमत्कार भी यहीं करते हैं।

पेत्रुस का अस्वीकरण – विरोधी प्रभु को सबसे पहले प्रधानयाजक के पास ले जाते हैं। ज्ञात हो इन्हीं के अध्यक्षा में प्रभु को नष्ट करने का षड्यंत्र रचा गया था। इस बीच पेत्रुस एक नौकरानी के सामने भी अपने प्रभु को स्वीकार नहीं कर पाए। और प्रभु के कथनानुसार पेत्रुस अपने प्रभु को तीन बार अस्वीकार कर देते हैं।

अत्याचार – हम सोच सकते हैं कि प्यादों का दल प्रभु के साथ क्या-क्या किया होगा। विश्वमंडल के प्रभु के साथ इतना अत्याचार। उनके लिए कुछ भी असंभव नहीं था। फिर भी वे सबकुछ सहते गया। वास्तव में वे स्वयं अपने आपको हमारे लिए बलि चढ़ाते जा रहे थे। वे एक भी अवसर को ऐसे ही जाने नहीं देना चाहे।

यहूदी महासभा के सामने – यहूदी महासभा में जनता के नेता, महायाजक और शास्त्री शामिल थे। इसके पहले के अध्यायों को ध्यान से पढ़ने से हमें पता चलता है कि इन लोग मिलकर ही प्रभु के विरुद्ध षड्यंत्र रचे थे। प्रभु अकेले पड़ जाते हैं। उनके साथ कोई भी नहीं। उनके साथ क्या बीत रहा होगा।

यूदस का विश्वासघात

1) पास्का, बेख़मीर रोटी का पर्व, निकट था।

2) महायाजक और शास्त्री ईसा के सर्वनाश का उपाय ढूँढ़ रहे थे, परन्तु वे जनता से डरते थे।

3) उस समय शैतान यूदस में घुस गया। यूदस इसकारियोती कहलाता था और बारहों में से एक था।

4) उसने महायाजकों और मन्दिर-आरक्षी के नायकों के पास जा कर उनके साथ यह परामर्श किया कि वह किस प्रकार ईसा को उनके हवाले कर दे।

5) वे बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे रूपया देने का वादा किया।

6) यूदस सहमत हो गया और वह जनता के अनजान में ईसा को पकड़वाने का अवसर ढूँढ़ता रहा।

पास्का की तैयारी

7) बेख़मीर रोटी का दिन आया, जब पास्का के मेमने की बलि चढ़ाना आवश्यक था।

8) ईसा ने पेत्रुस और योहन को यह कहते हुए भेजा, “जा कर हमारे लिए पास्काभोज की तैयारी करो”।

9) उन्होंने ईसा से पूछा, “आप क्या चाहते हैं? हम कहाँ उसकी तैयारी करें?”

10) ईसा ने उत्तर दिया, “शहर में आने पर तुम्हें पानी का घड़ा लिये एक पुरुष मिलेगा। उसके पीछे-पीछे चलना और जिस घर में वह प्रवेश करे,

11) उस घर के स्वामी से कहना, ‘गुरूवर ने आप को कहला भेजा है-अतिथिशाला कहाँ है, जहाँ मैं अपने शिष्यों के साथ पास्का का भोजन करूँ?”

12) और वह तुम्हें ऊपर एक सजा-सजाया बड़ा कमरा दिखा देगा। वहीं तैयार करना।’

13) वे चल पड़े। ईसा ने जैसा कहा था, उन्होंने सब कुछ वैसा ही पाया और पास्का-भोज की तैयारी कर ली।

पास्का का भोज

14) समय आने पर ईसा प्रेरितों के साथ भोजन करने बैठे

15) और उन्होंने उन से कहा, “मैं कितना चाहता था कि दुःख भोगने से पहले पास्का का यह भोजन तुम्हारे साथ करूँ;

16) क्योंकि मैं तुम लोगों से कहता हूँ, जब तक यह ईश्वर के राज्य में पूर्ण न हो जाये, मैं इसे फिर नहीं खाऊँगा”।

17) इसके बाद ईसा ने प्याला लिया, धन्यवाद की प्रार्थना पढ़ी और कहा, “इसे ले लो और आपस में बाँट लो;

18) क्योंकि मैं तुम लोगों से कहता हूँ, जब तक ईश्वर का राज्य न आये, मैं दाख का रस फिर नहीं पिऊँगा”।

परमप्रसाद की स्थापना

19) उन्होंने रोटी ली और धन्यवाद की प्रार्थना पढ़ने के बाद उसे तोड़ा और यह कहते हुए शिष्यों को दिया, “यह मेरा शरीर है, जो तुम्हारे लिए दिया जा रहा है। यह मेरी स्मृति में किया करो”।

20) इसी तरह उन्होंने भोजन के बाद यह कहते हुए प्याला दिया, “यह प्याला मेरे रक्त का नूतन विधान है। यह तुम्हारे लिए बहाया जा रहा है।

यूदस के विश्वासघात का संकेत

21) “देखो, मेरे विश्वासघाती का हाथ मेरे साथ मेज़ पर है।

22) मानव पुत्र तो, जैसा लिखा है, चला जाता है; किन्तु धिक्कार उस मनुष्य को, जो उसे पकड़वाता है!’

23) वे एक दूसरे से पूछने लगे कि हम लोगों में कौन यह काम करने वाला है।

शिष्यों में बड़ा कौन

24) उन में यह विवाद छिड़ गया कि हम में किस को सब से बड़ा समझा जाना चाहिए।

25) ईसा ने उन से कहा, “संसार में राजा अपनी प्रजा पर निरंकुश शासन करते हैं और सत्ताधारी संरक्षक कहलाना चाहते हैं।

26) परन्तु तुम लोगों में ऐसा नहीं है। जो तुम में बड़ा है, वह सब से छोटे-जैसा बने और जो अधिकारी है, वह सेवक-जैसा बने।

27) आखि़र बड़ा कौन है-वह, जो मेज़ पर बैठता है अथवा वह, जो परोसता है? वहीं न, जो मेज़ पर बैठता है। परन्तु मैं तुम लोगों में सेवक-जैसा हूँ।

प्रेरितों का पुरस्कार

28) “तुम लोग संकट के समय मेरा साथ देते रहे।

29) मेरे पिता ने मुझे राज्य प्रदान किया है, इसलिए मैं तुम्हें यह वरदान देता हूँ

30) कि तुम मेरे राज्य में मेरी मेज़ पर खाओगे-पियोगे और सिंहासनों पर बैठ कर इस्राएल के बारह वंशों का न्याय करोगे।

पेत्रुस की भावी निर्बलता

31) “सिमोन! सिमोन! शैतान को तुम लोगों को गेहूँ की तरह फटकने की अनुमति मिली है।

32) परन्तु मैंने तुम्हारे लिए प्रार्थना की है, जिससे तुम्हारा विश्वास नष्ट न हो। जब तुम फिर सही रास्ते पर आ जाओगे, तो अपने भाइयों को भी सँभालोगे।”

33) “पेत्रुस ने उन से कहा, “प्रभु! मैं आपके साथ बन्दीगृह जाने और मरने को भी तैयार हूँ”।

34) किन्तु ईसा के कहा, “पेत्रुस! मैं तुम से कहता हूँ कि आज, मुर्गे के बाँग देने से पहले ही, तुम तीन बार यह अस्वीकार करोगे कि तुम मुझे जानते हो”।

भावी संकट

35) ईसा ने उन से कहा, “जब मैंने तुम्हें थैली, झोली और जूतों के बिना भेजा तो क्या तुम्हें किसी बात की कमी हुई थी?”

36) उन्होंने उत्तर दिया, “किसी बात की नहीं”। इस पर ईसा ने कहा, “परन्तु अब जिसके पास थैली है, वह उसे ले ले और अपनी झोली भी और जिसके पास नहीं है, वह अपना कपड़ा बेच कर तलवार ख़रीद ले;

37) क्योंकि मैं तुम से कहता हूँ कि धर्मग्रन्थ का यह कथन मुझ में अवश्य पूरा होगा-उसकी गिनती कुकर्मियों में हुई। और जो कुछ मेरे विषय में लिखा है, वह पूरा होने को है।”

38) शिष्यों ने कहा, “प्रभु! देखिए, यहाँ दो तलवारें हैं”। परन्तु ईसा ने कहा, “बस! बस!”

प्रभु की प्राणपीड़ा

39) ईसा बाहर निकल कर अपनी आदत के अनुसार जैतून पहाड़ गये। उनके शिष्य भी उनके साथ हो लिये।

40) ईसा ने वहाँ पहुँच कर उन से कहा, “प्रार्थना करो, जिससे तुम परीक्षा में न पड़ो”।

41) तब वे पत्थर फेंकने की दूरी तक उन से अलग हो गये और घुटने टेक कर उन्होंने यह कहते हुए प्रार्थना की,

42) “पिता! यदि तू ऐसा चाहे, तो यह प्याला मुझ से हटा ले। फिर भी मेरी नहीं, बल्कि तेरी ही इच्छा पूरी हो।”

43) तब उन्हें स्वर्ग का एक दूत दिखाई पड़ा, जिसने उन को ढारस बँधाया।

44) वे प्राणपीड़ा में पड़ने के कारण और भी एकाग्र हो कर प्रार्थना करते रहे और उनका पसीना रक्त की बूँदों की तरह धरती पर टपकता रहा।

45) वे प्रार्थना से उठ कर अपने शिष्यों के पास आये और यह देख कर कि वे उदासी के कारण सो गये हैं,

46) उन्होंने उन से कहा, “तुम लोग क्यों सो रहे हो? उठो और प्रार्थना करो, जिससे तुम परीक्षा में न पड़ो।”

ईसा की गिरफ़्तारी

47) ईसा यह कह ही रहे थे कि एक दल आ पहुँचा। यूदस, बारहों में से एक, उस दल का अगुआ था। उसने ईसा के पास आ कर उनका चुम्बन किया।

48) ईसा ने उस से कहा, “यूदस! क्या तुम चुम्बन दे कर मानव पुत्र के साथ विश्वासघात कर रहे हो?”

49) ईसा के साथियों ने यह देख कर कि क्या होने वाला है, उन से कहा, “प्रभु! क्या हम तलवार चलायें?”

50) और उन में एक ने प्रधानयाजक के नौकर पर प्रहार किया और उसका दाहिना कान उड़ा दिया।

51) किन्तु ईसा ने कहा, “रहने दो, बहुत हुआ”, और उसका कान छू कर उन्होंने उसे अच्छा कर दिया।

52) जो महायाजक, मन्दिर-आरक्षी के नायक और नेता ईसा को पकड़ने आये थे, उन से उन्होंने कहा, “क्या तुम मुझ को डाकू समझ कर तलवारें और लाठियाँ ले कर निकले हो?

53) मैं प्रतिदिन मन्दिर में तुम्हारे साथ रहा और तुमने मुझ पर हाथ नहीं डाला। परन्तु यह समय तुम्हारा है-अब अन्धकार का बोलबाला है।”

पेत्रुस का अस्वीकरण

54) तब उन्होंने ईसा को गिरफ़्तार कर लिया और उन्हें ले जा कर प्रधानयाजक के यहाँ पहुँचा दिया। पेत्रुस कुछ दूरी पर उनके पीछे-पीछे चला।

55) लोग प्रांगण के बीच में आग जला कर उसके चारों ओर बैठ रहे थे। पेत्रुस भी उनके साथ बैठ गया।

56) एक नौकरानी ने आग के प्रकाश में पेत्रुस को बैठा हुआ देखा और उस पर दृष्टि गड़ा कर कहा, “यह भी उसी के साथ था”।

57) किन्तु उसने अस्वीकार करते हुए कहा, “नहीं भई! मैं उसे नहीं जानता”।

58 थोड़ी देर बाद किसी दूसरे ने पेत्रुस को देख कर कहा, “तुम भी उन्हीं लोगों में एक हो”। पेत्रुस ने उत्तर दिया, “नहीं भई! मैं नही हूँ”।

59) क़रीब घण्टे भर बाद किसी दूसरे ने दृढ़तापूर्वक कहा, “निश्चय ही यह उसी के साथ था। यह भी तो गलीली है।”

60) पेत्रुस ने कहा, “अरे भई! मैं नहीं समझता कि तुम क्या कह रहे हो”। वह बोल ही रहा था कि उसी क्षण मुर्गे ने बाँग दी

61) और प्रभु ने मुड़ कर पेत्रुस की ओर देखा। तब पेत्रुस को याद आया कि प्रभु ने उस से कहा था कि आज मुर्गे के बाँग देने से पहले ही तुम मुझे तीन बार अस्वीकार करोगे,

62) और वह बाहर निकल कर फूट-फूट कर रोया।

अत्याचार

63) ईसा पर पहरा देने वाले प्यादे उनका उपहास और उन पर अत्याचार करते थे।

64) वे उनकी आँखों पर पट्टी बाँध कर उन से पूछते थे, “यदि तू नबी है, तो हमें बता-तुझे किसने मारा?”

65) वे उनका अपमान करते हुए उन से और बहुत-सी बातें कहते रहे।

यहूदी महासभा के सामने

66) दिन निकलने पर जनता के नेता, महायाजक और शास्त्री एकत्र हो गये और उन्होंने ईसा को अपनी महासभा में बुला कर उन से कहा,

67) “यदि तुम मसीह हो, तो हमें बता दो”। उन्होंने उत्तर दिया, यदि मैं आप लोगों से कहूँगा, तो आप विश्वास नहीं करेंगे

68) और यदि मैं प्रश्न करूँगा, तो आप लोग उत्तर नहीं देंगे।

69) परन्तु अब से मानव पुत्र सर्वशक्तिमान् ईश्वर के दाहिने विराजमान होगा।”

70) इस पर सब-के-सब बोल उठे, “तो क्या तुम ईश्वर के पुत्र हो?’ ईसा ने उत्तर दिया, “आप लोग ठीक ही कहते हैं। मैं वही हूँ।”

71) इस पर उन्होंने कहा, “हमें और गवाही की ज़रूरत ही क्या है? हमने तो स्वयं इसके मुँह से सुन लिया है।”

The Content is used with permission from www.jayesu.com