योहन अध्याय 21

सन्त योहन का सुसमाचार- अध्याय 21

संत योहन रचित सुसमाचार अध्याय 21 विशेष रूप से पुनर्जीवित प्रभु और संत पेत्रुस एवं संत योहन के बीच ही सीमित है। यह अध्याय संत योहन रचित सुसमाचार का अंतिम भी है। इन बातों को ध्यान से पढ़ने की जरुरत है, क्योंकि ये बातें अन्य सुसमाचारों में नहीं बायी जाती हैं।

इस अध्याय में इन विशेष बातों को देख सकते हैं :-

तिबेरियस के समुद्रतट पर दर्शन – पुनर्जीवित प्रभु अपने प्रेरितों में से 7 को दिखाई देते हैं। वे संत पेत्रुस के नेतृत्व में मछली मारने गए हुए थे। अन्य तीनों सुसमाचारों में प्रभु कुछ प्रेरितों को मछली मरते हुए या अपने जाल को साफ़ करते हुए पाते हैं और बुलाते हैं। संत योहन रचित सुसमाचार में उस प्रकार का वणन नहीं है।

इस घटना के समान एक दूसरी घटना को संत लूकस (5:1-11) में देख सकते हैं।

यहाँ भी प्रिय शिष्य ही उन्हें पहले पहचान लेता है और संत पेत्रुस अपने प्रभु से मिलने समुद्र पर खूद पड़ते हैं।

पेत्रुस को परम अधिकार – अन्य सुसमाचारों में संत पेत्रुस प्रभु पर अपना विश्वास प्रकट करते हुए बताया गया है। उसके बाद प्रभु उनको कलीसिया के मुख्य के रूप में – प्रेरितों के मुख्य – घोषित करते हुए भी देख सकते हैं।
लेकिन संत योहन उस घटना का वर्णन नहीं करते हैं। लेकिन प्रभु के पुनरत्थान के बाद की घटना का वर्णन करते हैं जो अन्य सुसमाचारों में नहीं पायी जाती है।
यह घटना इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि जो संत पेत्रुस अपने प्रभु को तीन बार अस्वीकार किये थे, प्रभु उनके दुःख को दूर करते हुए उन्हें और मजबूत करते हुए वर्णन है।

प्रभु पेत्रुस से यह नहीं पूछते हैं कि वह उन में “विश्वास” करते हैं कि नहीं, बल्कि वह प्रभु से “प्यार” करते हैं कि नहीं। विश्वास से आगे निकल जाते हैं और प्रेम के मार्ग पर उन्हें ले चलकर मज़बूत करते हैं।
तीन बार पेत्रुस से यह सवाल पूछने के बाद, “क्या तुम मुझे प्यार करते हो?” प्रभु उन्हें अपनी भेड़ों को चराने की जिम्मेदारी देते हैं।

नोट :- संत पिता (Pope) संत पेत्रुस के उत्तराधिकारी हैं।

योहन का भविष्य – संत योहन ही एक मात्र प्रेत हैं जो शहीद नहीं हुए थे। जरूर वे निर्वासित कर दिए गए थे।

उपसंहार – प्रभु के सभी कार्य या शिक्षा का वर्णन इस पुस्तक में नहीं है। संत योहन का लक्ष्य यह था कि हम इस सुसमाचार के द्वारा विश्वास कर पाएं और विश्वास के द्वारा अनंत जीवन प्राप्त कर सकें।

तिबेरियस के समुद्रतट पर दर्शन

1) बाद में ईसा तिबेरियस के समुद्र के पास, अपने शिष्यों को फिर दिखाई दिये। यह इस प्रकार हुआ।

2) सिमोन पेत्रुस, थोमस जो यमल कहलाता था, नथनाएल, जो गलीलिया के काना का निवासी था, ज़ेबेदी के पुत्र और ईसा के दो अन्य शिष्य साथ थे।

3) सिमोन पेत्रुस ने उन से कहा, “मैं मछली मारने जा रहा हूँ”। वे उस से बोले, “हम भी तुम्हारे साथ चलते हैं”। वे चल पडे और नाव पर सवार हुये, किन्तु उस रात उन्हें कुछ नहीं मिला।

4) सबेरा हो ही रहा था कि ईसा तट पर दिखाई दिये; किन्तु शिष्य उन्हें नही पहचान सके।

5) ईसा ने उन से कहा, “बच्चों! खाने को कुछ मिला?” उन्होने उत्तर दिया, “जी नहीं”।

6) इस पर ईसा ने उन से कहा, “नाव की दाहिनी ओर जाल डाल दो और तुम्हें मिलेगा”। उन्होंने जाल डाला और इतनी मछलियाँ फस गयीं कि वे जाल नहीं निकाल सके।

7) तब उस शिष्य ने, जिसे ईसा प्यार करते थे, पेत्रुस से कहा, “यह तो प्रभु ही हैं”। जब पेत्रुस ने सुना कि यह प्रभु हैं, तो वह अपना कपड़ा पहन कर- क्योंकि वह नंगा था- समुद्र में कूद पडा।

8) दूसरे शिष्य मछलियेां से भरा जाल खीचतें हुये डोंगी पर आये। वे किनारे से केवल लगभग दो सौ हाथ दूर थे।

9) उन्होंने तट पर उतरकर वहाँ कोयले की आग पर रखी हुई मछली देखी और रोटी भी।

10) ईसा ने उन से कहा, “तुमने अभी-अभी जो मछलियाँ पकडी हैं, उन में से कुछ ले आओ।

11) सिमोन पेत्रुस गया और जाल किनारे खीचं लाया। उस में एक सौ तिरपन बड़ी बड़ी मछलियाँ थी और इतनी मछलियाँ होने पर भी जाल नहीं फटा था।

12) ईसा ने उन से कहा, “आओ जलपान कर लो”। शिष्यों में किसी को भी ईसा से यह पूछने का साहस नहीं हुआ कि आप कौन हैं। वे जानते थे कि वह प्रभु हैं।

13) ईसा अब पास आये। उन्होंने रोटी ले कर उन्हें दी और इसी तरह मछली भी।

14) इस प्रकार ईसा मृतकों में से जी उठने के बाद तीसरी बार अपने शिष्यों के सामने प्रकट हुये।

पेत्रुस को परम अधिकार

15) जलपान के बाद ईसा ने सिमोन पेत्रुस से कहा, “सिमोन योहन के पुत्र! क्या इनकी अपेक्षा तुम मुझे अधिक प्यार करते हो?” उसने उन्हें उत्तर दिया, “जी हाँ प्रभु! आप जानते हैं कि मैं आप को प्यार करता हूँ”। उन्होंने पेत्रुस से कहा, “मेरे मेमनों को चराओ”।

16) ईसा ने दूसरी बार उस से कहा, “सिमोन, योहन के पुत्र! क्या तुम मुझे प्यार करते हो?” उसने उत्तर दिया, “जी हाँ प्रभु! आप जानते हैं कि मैं आप को प्यार करता हूँ”। उन्होंने पेत्रुस से कहा, “मेरी भेडों को चराओ”।

17) ईसा ने तीसरी बार उस से कहा, “सिमोन योहन के पुत्र! क्या तुम मुझे प्यार करते हो?” पेत्रुस को इस से दुःख हुआ कि उन्होंने तीसरी बार उस से यह पूछा, ’क्या तुम मुझे प्यार करते हो’ और उसने ईसा से कहा, “प्रभु! आप को तो सब कुछ मालूम है। आप जानते हैं कि मैं आपको प्यार करता हूँ।“ ईसा ने उससे कहा, मेरी भेड़ों को चराओ”।

18) “मैं तुम से यह कहता हूँ – जवानी में तुम स्वयं अपनी कमर कस कर जहाँ चाहते थे, वहाँ घूमते फिरते थे; लेकिन बुढ़ापे में तुम अपने हाथ फैलाओगे और दूसरा व्यक्ति तुम्हारी कमर कस कर तुम्हें वहाँ ले जायेगा। जहाँ तुम जाना नहीं चाहते।”

19) इन शब्दों से ईसा ने संकेत किया कि किस प्रकार की मृृत्यु से पेत्रुस द्वारा ईश्वर की महिमा का विस्तार होगा। ईसा ने अंत में पेत्रुस से कहा, “मेरा अनुसरण करो”।

योहन का भविष्य

20) पेत्रुस ने मुड़ कर उस शिष्य को पीछे पीछे आते देखा जिसे ईसा प्यार करते थे और जिसने व्यारी के समय उनकी छाती पर झुक कर पूछा था, ’प्रभु! वह कौन है, जो आप को पकड़वायेगा?’

21) पेत्रुस ने उसे देखकर ईसा से पूछा, “प्रभ! इनका क्या होगा?”

22) ईसा ने उसे उत्तर दिया, “यदि मैं चाहता हूँ कि यह मेरे आने तक रह जाये तो इस से तुम्हें क्या? तुम मेरा अनुसरण करो।”

23) इन शब्दों के कारण भाइयों में यह अफ़वाह फैल गयी कि वह शिष्य नहीं मरेगा। परन्तु ईसा ने यह नहीं कहा कि यह नहीं मरेगा; बल्कि यह कि ’यदि मैं चाहता हूँ कि यह मेरे आने तक रह जाये, तो इस से तुम्हें क्या?’

उपसंहार

24) यह वही शिष्य है, जो इन बातों का साक्ष्य देता है और जिसने यह लिखा है। हम जानते हैं कि उसका साक्ष्य सत्य है।

25) ईसा ने और भी बहुत से कार्य किये। यदि एक-एक कर उनका वर्णन किया जाता तो मैं समझता हूँ कि जो पुस्तकें लिखी जाती, वे संसार भर में भी नहीं समा पातीं।

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संत योहन रचित सुसमाचार को अच्छे से समझने इसके परचिय पर बनाये गए वीडियो को देखिये।