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लूकस अध्याय 17

सन्त लूकस रचित सुसमाचार – अध्याय 17

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लूकस अध्याय 17 का परिचय

संत लूकस रचित सुसमाचार अध्याय 17 में हम निम्न बातों को देख सकते हैं :-

बुरा उदाहरण – प्रलोभन पाप का द्वार कहा जा सकता है। हम जाने अनजाने में एक दूसरे के लिए पाप का कारण बन जाते हैं। दूसरों के गुस्सा का कारण बनना भी तो पाप है। प्रलोभन का कारण केवल कर्म से ही नहीं सोच, हावभाव, पहनाव से भी हो सकता है।

क्षमाशीलता – क्षमा बोलना आसान है, लेकिन करना बहुत ही कठिन। क्षमाशीलता एक ईश्वरीय गुण और कार्य भी है। हम वचन में पढ़ते हैं कि केवल ईश्वर पाप-क्षमा कर सकता है। और वही ईश्वर हम से चाहता है कि हम भी उनके समान ईश्वरीय, अर्थात क्षमाशील बनें।

विश्वास – विश्वास ईश्वर का वरदान है। ईश्वर ही हमें यह वरदान दे सकते हैं। इसलिए शिष्यों ने प्रभु से अपने विश्वास को बढ़ाने की मांग की। लेकिन प्रभु एक महत्वपूर्ण बात को उन्हें समझाये। उन में विश्वास ही नहीं था। क्या हम में विश्वास है?
विनम्रता – हम चाहते हैं कि लोग हमारे कार्यों के लिए हमारी प्रशंसा करें। लेकिन प्रभु कहते हैं कि सबकुछ करने के बाद यह कहना है की “मैं तो सेवक मात्र ही हूँ”।

दस कोढ़ी – दस कोढ़ियों में से नौ यहूदी थे और एक गैर-यहूदी। प्रभु सबको चंगा करते हैं। यहूदी नियम का पालन करते हुए मंदिर गए, लेकिन वह गैर-यहूदी प्रभु के पास धन्यवाद देने आता है। और प्रभु उसको विश्वास का वरदान देकर घर भेजते हैं। चंगाई विश्वास का कारण बनना चाहिए। इनमें से हम किसके समान हैं?

ईश्वर के राज्य का आगमन – राज्य कहने से हमें इस दुनिया के राजा और उनके राज्य याद आते हैं। लेकिन प्रभु कहते हैं कि ईश्वर प्रकट रूप से नहीं आते हैं। हमें उनकी भाषा समझने की जरुरत है। और प्रभु कहते हैं कि वे हमारे बीच में हैं।

प्रभु का पुनरागमन – प्रभु के महिमापूर्ण दूसरे आगमन के समय सबकुछ बदल जायेगा। हमें अपने आपको बचाने की कोशिश नहीं करने का सलाह प्रभु देते हैं। हमें अपने बारे में नहीं बल्कि ईश्वर और उनके राज्य के बारे में चिंता करने की शिक्षा प्रभु हमें देते हैं।

बुरा उदाहरण

1) ईसा ने अपने शिष्यों से कहा, “प्रलोभन अनिवार्य है, किन्तु धिक्कार उस मनुष्य को, जो प्रलोभन का कारण बनता है!

2) उन नन्हों में एक के लिए भी पाप का कारण बनने की अपेक्षा उस मनुष्य के लिए अच्छा यही होता कि उसके गले में चक्की का पाटा बाँधा जाता और वह समुद्र में फेंक दिया जाता।

3) इसलिए सावधान रहो।

क्षमाशीलता

“यदि तुम्हारा भाई कोई अपराध करता है, तो उसे डाँटो और यदि वह पश्चात्ताप करता है, तो उसे क्षमा कर दो।

4) यदि वह दिन में सात बार तुम्हारे विरुद्ध अपराध करता और सात बार आ कर कहता है कि मुझे खेद है, तो तुम उसे क्षमा करते जाओ।”

विश्वास

5) प्रेरितों ने प्रभु से कहा, “हमारा विश्वास बढ़ाइए”।

6) प्रभु ने उत्तर दिया, “यदि तुम्हारा विश्वास राई के दाने के बराबर भी होता और तुम शहतूत के इस पेड़ से कहते, ‘उखड़ कर समुद्र में लग जा’, तो वह तुम्हारी बात मान लेता।

विनम्रता

7) “यदि तुम्हारा सेवक हल जोत कर या ढोर चरा कर खेत से लौटता है, तो तुम में ऐसा कौन है, जो उससे कहेगा, “आओ, तुरन्त भोजन करने बैठ जाओ’?

8) क्या वह उस से यह नहीं कहेगा, ‘मेरा भोजन तैयार करो। जब तक मेरा खाना-पीना न हो जाये, कमर कस कर परोसते रहो। बाद में तुम भी खा-पी लेना’?

9) क्या स्वामी को उस नौकर को इसीलिए धन्यवाद देना चाहिए कि उसने उसकी आज्ञा का पालन किया है?

10) तुम भी ऐसे ही हो। सभी आज्ञाओं का पालन करने के बाद तुम को कहना चाहिए, ‘हम अयोग्य सेवक भर हैं, हमने अपना कर्तव्य मात्र पूरा किया है’।”

दस कोढ़ी

11) ईसा येरूसालेम की यात्रा करते हुए समारिया और गलीलिया के सीमा-क्षेत्रों से हो कर जा रहे थे।

12) किसी गाँव में प्रवेश करने पर उन्हें दस कोढ़ी मिले,

13) जो दूर खड़े हो गये और ऊँचे स्वर से बोले, “ईसा! गुरूवर! हम पर दया कीजिए”।

14) ईसा ने उन्हें देख कर कहा, “जाओ और अपने को याजकों को दिखलाओ”, और ऐसा हुआ कि वे रास्ते में ही नीरोग हो गये।

15) तब उन में से एक यह देख कर कि वह नीरोग हो गया है, ऊँचे स्वर से ईश्वर की स्तुति करते हुए लौटा।

16) वह ईसा को धन्यवाद देते हुए उनके चरणों पर मुँह के बल गिर पड़ा, और वह समारी था।

17) ईसा ने कहा, “क्या दसों नीरोग नहीं हुए? तो बाक़ी नौ कहाँ हैं?

18) क्या इस परदेशी को छोड़ और कोई नहीं मिला, जो लौट कर ईश्वर की स्तुति करे?”

19) तब उन्होंने उस से कहा, “उठो, जाओ। तुम्हारे विश्वास ने तुम्हारा उद्धार किया है।”

ईश्वर के राज्य का आगमन

20) जब फ़रीसियों ने उन से पूछा कि ईश्वर का राज्य कब आयेगा, तो ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, “ईश्वर का राज्य प्रकट रूप से नहीं आता।

21) लोग नहीं कह सकेंगे, ‘देखो-वह यहाँ है’ अथवा, ‘देखो-वह वहाँ है’; क्योंकि ईश्वर का राज्य तुम्हारे ही बीच है।”

प्रभु का पुनरागमन

22) ईसा ने अपने शिष्यों से कहा, “ऐसा समय आयेगा, जब तुम मानव पुत्र का एक दिन भी देखना चाहोगे, किन्तु उसे नहीं देख पाओगे।

23) लोग तुम से कहेंगे, ’देखो-वह यहाँ है’, अथवा, ‘देखो-वह वहाँ है’, तो तुम उधर नहीं जाओगे, उनके पीछे नहीं दौड़ोगे;

24) क्योंकि जैसे बिजली आकाश के एक छोर से निकल कर दूसरे छोर तक चमकती है, वैसे ही मानव पुत्र अपने दिन प्रकट होगा।

25) परन्तु पहले उसे बहुत दुःख सहना और इस पीढ़ी द्वारा ठुकराया जाना है।

26) “जो नूह के दिनों में हुआ था, वही मानव पुत्र के दिनों में भी होगा।

27) नूह के जहाज़ पर चढ़ने के दिन तक लोग खाते-पीते और शादी-ब्याह करते रहे। तब जलप्रलय आया और उसने सब को नष्ट कर दिया।

28) लोट के दिनों में भी यही हुआ था। लोग खाते-पीते, लेन-देन करते, पेड़ लगाते और घर बनाते रहे;

29) परन्तु जिस दिन लोट ने सोदोम छोड़ा, ईश्वर ने आकाश से आग और गंधक बरसायी और सब-के-सब नष्ट हो गये।

30) मानव पुत्र के प्रकट होने के दिन वैसा ही होगा।

31) “उस दिन जो छत पर हो और उसका सामान घर में हो, वह उसे ले जाने नीचे न उतरे और जो खेत में हो, वह भी घर न लौटे।

32) लोट की पत्नी को याद करो।

33) जो अपना जीवन सुरक्षित रखने का प्रयत्न करेगा, वह उसे खो देगा, और जो उसे खो देगा, वह उसे सुरक्षित रखेगा।

34) “मैं तुम से कहता हूँ, उस रात दो एक खाट पर होंगे-एक उठा लिया जायेगा और दूसरा छोड़ दिया जायेगा।

35) दो स्त्रियाँ साथ-साथ चक्की पीसती होंगी-एक उठा ली जायेगी और दूसरी छोड़ दी जायेगी।”

36) “मैं तुम से कहता हूँ, दो खेत में होंगे-एक उठा लिया जायेगा और दूसरा छोड़ दिया जायेगा।

37) इस पर उन्होंने ईसा से पूछा, “प्र्रभु! यह कहाँ होगा?” उन्होंने उत्तर दिया, “जहाँ लाश होगी, वहाँ गीध भी इकट्ठे हो जायेंगे”।

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